प्रकाश कुमार /प्रतापपुर (चतरा)
प्रतापपुर। जहां एक ओर दुनिया डिजिटल युग में आगे बढ़ रही है, वहीं चतरा जिले के प्रतापपुर प्रखंड के बरहे गांव के लोग आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं। घने जंगलों के बीच बसे इस गांव को प्रखंड मुख्यालय से जोड़ने वाली कोई सड़क नहीं है, नदी पर पुल ना होने से ग्रामीणों को हर साल खुद ही लकड़ी का अस्थायी पुल बनाना पड़ता है। यहां के ग्रामीण लकड़ी के पुल से आना जाना करते हैं। ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने कई बार नेताओं और सरकारी अधिकारियों से पुल बनवाने की मांग की है। लेकिन उन्हें सिर्फ झूठे आश्वासन मिले हैं। इस धोखे से तंग आकर, मनोज गंझू, बीरू महतो, मीना देवी और महेंद्र गंझू जैसे ग्रामीणों की अगुवाई में पूरा गांव मिलकर पेड़ों की टहनियों से पुल बना रहा है। ग्रामीण महेंद्र गंझू बताते हैं कि पुल न होने के कारण कई बच्चों की जान जा चुकी है, क्योंकि वे स्कूल जाते समय गहरे पानी का अंदाज़ा नहीं लगा पाते। समस्या सिर्फ बच्चों तक सीमित नहीं है। गर्भवती महिलाओं को अस्पताल ले जाते समय भी नदी में जलस्तर बढ़ जाने पर इंतजार करना पड़ता है। मनोज गंझू ने अपनी दर्दनाक कहानी साझा करते हुए बताया कि एक महीने पहले उनके बेटे को सांप ने काट लिया था और नदी में बाढ़ के कारण वे रात भर इंतजार करते रहे, और इसी दौरान उनके बेटे ने दम तोड़ दिया।

उत्क्रमित प्राथमिक विद्यालय बरहे के शिक्षक अर्जुन महतो भी इस समस्या से जूझते हैं। उन्हें बारिश में अपनी मोटरसाइकिल नदी के किनारे छोड़कर पैदल जाना पड़ता है, और कभी-कभी तो पानी कम न होने पर रात भर गांव में ही रहना पड़ता है। चतरा की उपायुक्त कृति श्री ने बताया कि जिला प्रशासन को जानकारी मिलने पर कार्रवाई की जाती है। चतरा विधायक जनार्दन पासवान ने भी समस्या को स्वीकार किया है और जल्द समाधान का आश्वासन दिया है। हालांकि, ग्रामीणों को अब नेताओं के झूठे वादों पर भरोसा नहीं है। यह कहानी सिर्फ बरहे गांव की नहीं, बल्कि उन लाखों लोगों की है जो आज भी विकास से कटे हुए हैं।
Author: news24jharkhandbihar
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