सूरज कुमार / महुआडांड़
गुमला जिले के डुमरी प्रखंड में स्थित लुचुतपाट की पहाडियों में अवस्थित प्राक एतेहासिक बाबा टांगीनाथ धाम काफी प्रसिद्ध है। यहां दूर दूर से लोग बाबा टांगीनाथ धाम पूजा अर्चना करने पहुंचते है। और मनोवांछित वर पाते है। बाबा टांगीनाथ धाम झारखंड के राजधानी रांची से करीब 175 किमी और जिला मुख्यालय से करीब 75 किमी दूर में स्थित है। यहां तक पहुंचने के लिए पक्की सड़क है। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक बाबा टांगी नाथ भगवान परशुराम का तपो स्थली है। भगवान परशुराम ने यहां अपने आराध्य देव शिव की घोर उपासना किए थें। सावन महीने में यहां श्रद्धालुओं का खूब भीड़ लगा रहता है।
पर्यटन विभाग के पहल पर जिला प्रशासन ने कराया सुंदरी करण
सदियों से लुचुत पाट के इस पहाड़ी में सैकड़ो शिवलिंग समेत अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमा बिखरी पड़ी थी। स्थानीय प्रशासन वा पर्यटन विभाग के पहल पर पहाड़ी में बिखरे प्रतिमाओं और शिव लिंग को कतारबद्ध तरीके से स्थापित कर और प्राक एतेहासिक शिव मंदिर को नया स्वरूप देकर विकसित किया गया। भक्तों ने बताया कि धार्मिक मान्यताओं के बाबा टांगी नाथ भगवान परशुराम का तपो स्थली है। भगवान परशुराम ने यहां शिव की घोर उपासना किए थे। और यहीं उन्होंने अपने फरसे को जमीन में गाड़ दिए। फरसे की ऊपरी आकृति त्रिशूल के जैसा दिखता है। श्रद्धालु इस फरसे की पूजा अर्चना करते हैं। महाशिवरात्रि पर जलाभिषेक और पूजा अर्चना करने के लिए यहां लाखों की संख्या में श्रद्धालु आते है। श्रद्धालुओं का मानना है कि टांगीनाथ धाम में साक्षात भगवान शिव निवास करते हैं। स्थानीय आदिवासी बैगा और पाहन ही यहां के पुजारी है। और उनके मुताबिक यह मंदिर काफी प्राचीन है। आश्चर्य की बात ये है कि टागीनाथ धाम में स्थापित त्रिशूल में कभी जंग नहीं लगता। खुले आसमान के नीचे धूप, छांव, बरसात- का कोई असर इस त्रिशूल पर नहीं पड़ता है। महाशिवरात्रि के मौके पर बाबा टांगीनाथ धाम में झारखंड समेत विभिन्न राज्यों से हजारों की संख्या में श्रद्धालु यहां आते हैं। महाशविरात्रि पर बाबा टांगीनाथ धाम तीन दिवसीय मेले का आयोजन किया जाता है।
पौराणिक महत्व: नारायण के प्रति क्रोध का पश्चाताप करने भगवन परशु राम पहुंचे थे लुचुतपाट पर्वत
त्रेतायुग में जब भगवान श्रीराम ने जनकपुर में आयोजित सीता स्वयंवर में भगवान शिव के धनुष तोड़ा, तो भगवान परशुराम काफी क्रोधित हो गए। इस दौरान लक्ष्मण से उनकी लंबी बहस हुई। और जब भगवान परशुराम को पता चला कि भगवान श्रीराम स्वयं नारायण ही हैं तो उन्हें बड़ी आत्मग्लानि हुई। नारायण के प्रति क्रोध करने का पश्चाताप करने के लिए घने जंगलों के बीच लुचुतपाट पर्वत श्रृंखला में आ गए। यहां वे भगवान शिव की स्थापना कर आराधना किए। स्थानीय झारखंड में फरसा को टांगी कहा जाता है, इसलिए इस स्थान का नाम टांगीनाथ धाम पड़ गया।
शनिदेव से भी जुड़ी है गाथा
टांगीनाथ धाम में प्राचीन शिवलिंग बिखरे पड़े हैं। यहां मौजूद कलाकृतियां- नक्काशियां और यहां की बनावट देवकाल की कहानी बयां करती हैं। साथ ही कई ऐसे स्रोत हैं, जो त्रेता युग में ले जाते हैं। वैसे एक कहानी और भी है, कहते हैं कि शिव इस क्षेत्र के पुरातन जातियों से संबंधित थे। शनिदेव के किसी अपराध के लिए शिव ने त्रिशूल फेंक कर वार किया तो वह इस पहाड़ी की चोटी पर आ धंसा,लेकिन उसका अग्र भाग जमीन के ऊपर रह गया जबकि त्रिशूल जमीन के नीचे कितना गड़ा है, यह कोई नहीं जानता।
Author: news24jharkhandbihar
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